"3 Idiots" को हटाया जाना क्या वाकई सरकार की भूल थी?

By: Admin
Apr 25 2017
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- नवल तिवारी

सुकमा जिले के बुर्कापाल और चिंतागुफा के बीच कल CRPF की 74वीं बटालियन पर हुए हमले में शहीद हुए 25 जवानों की शहादत के बाद बस्तर से लेकर दिल्ली तक को झकझोड्कर रख दिया. 350 से अधिक की संख्या में माओवादियों ने इस घटना को अंजाम दिया. इस माओवादी हमले ने एक बार फिर 2010 के CRPF की बटालियन पर ताड़मेटला में हुए दुनिया के सबसे बड़े माओवादी हमले की याद को ताज़ा कर दिया है जिसमे CRPF के 76 जवान शहीद हुए थे. लगभग 6 हफ्ते पहले भी सड़क निर्माण के लिए सुरक्षा दे रहे CRPF के जवानों पर माओवादियों ने इसी तरह हमला किया जिसमे 12 जवान शहीद हुए थे एक बार फिर सड़क निर्माण कि सरक्षा कर रहे जवानों पर इस हमले के साथ ही माओवादियों ने सीधा सन्देश दे दिया है कि वो बस्तर के इन क्षेत्रों में विकास नहीं होने देंगे. लेकिन यदि साल 2016 के आंकड़ो पर नज़र डालें तो माओवादी घटनाओं पर लगभग अंकुश लग चूका था. सर्वाधिक माओवाद प्रभावित क्षेत्र झीरम को माओवाद मुक्त क्षेत्र भी घोषित कर दिया गया था. जिसका सीधा श्रेय तत्कालीन बस्तर आईजी एस आर पी कल्लूरी और उनकी टीम को जाता है. ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या वाकई कल्लूरी और उनकी टीम को बस्तर से हटाया जाना शासन की भूल साबित हो रहा है?

ग्रामीणों ने हमले में दिया माओवादियों का साथ

अपनी कुशल रणनीति से कल्लूरी और उनकी टीम ने एक लम्बे अरसे के बाद बस्तर के ग्रामीणों को फ़ोर्स की मदद करने के लिए तैयार किया था. दूरस्थ गावों में जाकर लोगो को पुलिस की मदद करने के लिए प्रेरित किया था जिससे ग्रामीणों और फ़ोर्स के बीच सामंजस्य बना और ग्रामीणों ने माओवादियों को खदेड़ने के लिए फ़ोर्स कि पुरजोर मदद की. लेकिन कल्लूरी के जाने के बाद ये पहला मामला सामने आया जिसमे ग्रामीणों ने फ़ोर्स पर हमले के लिए एक बार फिर माओवादियों का साथ दिया.

पुलिस के सुचना तंत्र की बड़ी चूक?

घायल जवानों से बातचीत में मिली जानकारी के मुताबिक 350 से अधिक की संख्या में माओवादियों ने इस घटना को अंजाम दिया. अब सवाल ये उठता है कि इतनी बड़ी संख्या में माओवादियों की मौजूदगी की सुचना इंटेलिजेंस को न मिल पाना ये कहीं न कहीं सुचनातंत्र की खामियों को उजागर करता है. जबकि इस पुरे घटनाक्रम के दौरान माओवादियों को फ़ोर्स के पल पल की खबर थी यहाँ तक कि जवानों के भोजन का समय तक उन्हें पता था. जिसका फायदा उठाकर इस हमले को अंजाम दिया गया.

सोशल मीडिया पर भी उठने लगी कल्लूरी को वापस लाने की मांग

इतनी बड़ी माओवादी वारदात के बाद कल्लूरी की याद आना लाज़मी से बात है क्योंकि पिछले 3 साल में माओवादी घटनाएँ काफी कम हो गयी थी लगातार हो रहे आत्मसमर्पण ने मानों माओवादियों की कमर तोड़कर रख दि थी ऐसे में सोशल मीडिया पर निंदा के साथ ही कल्लूरी को बस्तर वापस लाने कि मांग उठने लगी थी. बस्तर से लेकर दिल्ली तक कई बड़ी हस्तियों ने कल्लूरी के समर्थन में ट्वीट भी किया जिसमे उन्होंने कल्लूरी को वापस लाने की बात कही. फेसबुक पर भी बड़ी संख्या में युवाओं और बुद्धिजीवी वर्ग के लोगों ने कल्लूरी को बस्तर लाने की बात का समर्थन किया.

इतनी बड़ी वारदात के बाद अब ठोस निर्णय लेने का वक़्त आ गया है. अब देखना ये होगा कि गृह मंत्रालय इस ओर कितनी संवेदनशीलता दिखाता है.इतनी बड़ी वारदात के बाद अब ठोस निर्णय लेने का वक़्त आ गया है. अब देखना ये होगा कि गृह मंत्रालय इस ओर कितनी संवेदनशीलता दिखाता है.


comments
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Yogesh panigrahi

Apr 25 2017
माओवादी हमले के लिए पूरी तरह सरकार जिम्मेदार है और यह सब सूचना तंत्र की विफलता है जवानों को सरकार द्वारा पर्याप्त सहायता मुहैया कराया जा रहा है किंतु राज्य सरकार की पुलिस और crpf पुलिस के बीच तालमेल का अभाव पहले भी था और अभी भी है राज्य पुलिस के मैदानी कर्मचारियों का कहना है कि सीआरपीएफ के जवान उनको शक की नजर से देखते हैं और राज पुलिस को ही नक्सलियों का मददगार मानते हैं जिसके कारण दोनों के बीच तालमेल कभी नहीं बढ़ता है
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