मीडिया से विश्वास, तकनीक से घात : अमन सिंह

By: Admin
May 19 2017
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छत्तीसगढ़ सरकार के प्रमुख सचिव अमन कुमार सिंह का एक लेख शुक्रवार को प्रदेश के मुख्य समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ है। सिंह ने सरकारी कामकाज से जुड़े एक अनुभव के साथ प्रदेश के मीडिया के साथ विश्वास के रिश्ते का एक निजी अनुभ‌व पेश किया है। इस लेख के सार में छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता की गौरवशाली परंपरा दर्शन  होते हैं। निसंदेह यह लेख राज्य की पत्रकारिता व प्रशासन से जुड़े सभी लोगों के बीच विश्वास कायम रखने की दिशा में कारगर होगा। तकनीक हवा-सी रफ्तार वाले तेज घोड़े सरीखी है। उसकी सवारी ऊर्जा से भरी और उत्साह से लबरेज होती है। परंतु, उस पर सवार व्यक्ति कितना ही सिद्ध क्यों न हो, जरा सी चूक उसे नीचे गिरा सकती है।ऐसा ही कुछ विश्वास की भावना के साथ है। विश्वास घड़े में जतन से सहेजा हुआ वह जल है जो जरा से सुराख से धीरे-धीरे रीत जाता है। उसकी दीवारें इतनी मजबूत होती है कि विश्वास को सहेज सकें, जब तक कोई अपना या पराया उसे खंडित न कर दे। दूसरा पहलू भी है। विश्वास की चंद बूंदें हमेशा घड़े को लबालब रखती हैं। यह सब इससे तय होता है कि इर्दगिर्द किस तरह के लोग थे। सुराख करने वाले या विश्वास में इजाफा करने वाले। 

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तकनीक और विश्वास के एक नए पहलू से कुछ दिन पहले मुझे रूबरू होने का मौका मिला। अड़तालीस घंटे के घटनाक्रम ने न केवल स्वयं के संबंध में मुझे नई दृष्टि प्रदान की बल्कि दूसरों के प्रति भी मेरा नजरिया बदल गया है। अनुभव नकारात्मक हों या सकारात्मक, हमारे दृष्टिकोण को, हमारे नजरिए को प्रभावित करते हैं। इस सिलसिले में कुछ दिन पहले मुझे अपने जीवन का नायाब अनुभव हुआ है। सरकारी काम के सिलसिले में हम कई काम ऐसे करते हैं, जो बहुत गोपनीय होते हैं और जिनको लेकर मीडिया में बड़ी जिज्ञासा होती है। हुआ यह कि मेरे ‘स्मार्ट फोन’ से एक गोपनीय नोट अनजाने में एक ऐसे व्हाट्स-एप ग्रुप में चला गया, जिसमें 75 सदस्य हैं और सब प्रखर पत्रकार हैं। धन्य है, वह पत्रकार साथी, जिन्होंने गोपनीय नोट ग्रुप में पोस्ट किये जाने की सूचना दी। मुझे तो बहुत समय यह अहसास करने में लगा कि इतनी बड़ी चूक हो गई है। वास्तव में वह जानकारी अधिकारिक रूप से प्रकाशित होने के लिए 48 घण्टे का वक्त था और वह जानकारी 75 प्रखर पत्रकारों के मोबाइल फोन में उपलब्ध थी, जो निश्चित तौर पर एक अनिश्चितता का और चिंता का सबब थी। उस नोट पर आधारित खबर का प्रकाशित या प्रसारित होना ब्रेकिंग न्यूज था लेकिन प्रशासनिक दृष्टि से घातक था। यह समझ में आ गया था कि तीर तरकश से निकल चुका है। और उसे वापस लाना तो संभव ही नहीं है। जानते हुये भी कि इसका कोई समाधान नहीं है। मैने अपने साथियों से परामर्श किया तो सबने अपने-अपने अनुसार सुझाव भी दिए। इनमें से कोई भी परामर्श निदान कर देने में समर्थ नहीं दिख रहा था। अभी तो सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि आज के ब्रेकिंग खबर के दौर में हाथ में पहुंचे हुए समाचार को सार्वजनिक होने से रोका कैसे जाए। ऐसे मौके पर अतीत के अनुभवों को आधार बनाते हुए अपने विवेक से एक फैसला लिया। यह फैसला मेरे ढाई दशक के सार्वजनिक जीवन के उस अनुभव पर आधारित था, जो यह अहसास कराता रहा है कि सार्वजनिक जीवन की सबसे बड़ी पूंजी ‘विश्वास’ है, जो आपके काम करने के तरीके और उसके पीछे की नीयत के आधार पर ही निर्मित होता है। मीडिया के संबंध में भी इस तथ्य को झुठलाया नहीं जा सकता कि जनहित, राज्यहित अथवा राष्ट्रहित का अगर विषय हो तो वह आपका साथ देता ही है। पत्रकार साथी गोपनीयता और निजता की रक्षा करते हैं बशर्ते कार्य को लेकर उनका यह भरोसा हो कि यह जनहित या राष्ट्रहित की दृष्टि से जरूरी है। हालांकि इस निजी अवधारणा में कुछ खतरे भी थे। यह चंद पत्रकार मित्रों को लेकर विषय नहीं था, यह 75 मीडियाकर्मियों पर सामूहिक भरोसे का मसला था। फिर भी मैंने उस वक्त दिल की सुनी और सब पर सामूहिक रूप से भरोसा करने का फैसला किया। इसके तहत उसी गु्रप में एक संदेश अपनी तरफ से यह पोस्ट किया कि ‘‘आंतरिक समन्वय के लिए तैयार किया गया एक नोट अनजाने में इस समूह में गलती से पोस्ट हो गया है मीडिया के मित्रों से अनुरोध है कि वे इसे प्रसारित न करें और न ही इसका उपयोग करें।कृपया इसे डिलीट कर दें। आप हमेशा मेरे मददगार रहे हैं इस सहयोग के लिए मै आपका आभारी रहूॅगा‘‘। इस संदेश की प्रतिक्रिया ही इस लेख की बुनियाद है। कुछ साथियों ने तो गु्रप में ही पोस्ट करकर वादा किया कि वह इस पोस्ट का कोई उपयोग नहीं करेंगे, कुछ ने फोन करके सहमति दी। आश्चर्यजनक रूप से किसी भी पत्रकार साथी ने उस नोट का किसी भी रूप में उपयोग नहीं किया। शायद यह भरोसा ही छत्तीसगढ़ की तासीर और पहचान है। यह पूरा घटनाक्रम तमाम सबक छोड़ गया। फिर भी तीन सबक ऐसे हैं जो आपसे साझा करने हैं।

पहला सबक, टेक्नालॉजी के वरदान से अभिशाप बनने के बीच की दूरी सिर्फ एक क्लिक ही होती है इसलिए टेक्नालॉजी का उपयोग करने के पहले सुरक्षात्मक उपायों की जानकारी जरूर रखनी चाहिए। एक हद से ज्यादा तकनीक पर भरोसा किस तरह अभिशाप बन सकता है, इस घटना ने मुझे सिखाया है। तकनीक हमारी जिंदगी को आसान बनाती है तो हमें कठिन हालात में भी डाल सकती है। दूसरा सबक बेहद मानवीय है कि यदि ऐसी महत्वपूर्ण जानकारी आपके अलावा किसी और से, किसी सहयोगी के कारण लीक होती तो आपका रवैया क्या होता। क्या आप उतने ही सहिष्णु होते, जितने खुद के लिए। और इससे मुझे सरकार के काम-काज के दौरान, अपने सहयोगियों के साथ व्यवहार के दौरान, उनके पहलू को समझने और उन पर विश्वास करने की सीख मिली है। तीसरा सबक मीडिया कोलेकर यह है कि लोकतंत्र का यह स्तंभ आज भी अपनी जिम्मेदारी के प्रति उतना ही जवाबदेह और समर्पित है जिसकी अपेक्षा समाज चिरकाल से रखता चला आ रहा है। यह अनुभव मीडिया के प्रति हमारे मन में सम्मान और विश्वास को बढ़ाता है। लगभग सभी प्रमुख समाचार पत्र और चैनलों के पत्रकारों ने खबर हाथ में आने के बावजूद हालात को समझते हुए जिस तरह भरोसे को कायम रखा वह अनुकरणीय है। इस घटना से साबित हुआ कि सबकुछ समाप्त कभी नहीं होता। हमेशा कुछ सकारात्मक बचा रहता है। उसे हासिल करने का एक ही तरीका है-सबका आप पर विश्वास। तकनीक के घात के बावजूद इन नाजुक पलों में मीडिया के साथियों ने अपनी भरोसे की बूंदों से विश्वास के घड़े को लबालब कर दिया। कहते  हैं कि सबक ठोकर खाने के बाद हासिल होते हैं। लेकिन इस घटना के बाद सुखांत ने भी शिक्षक बनकर मुझे जो सबक दिए हैं वे जीवन पर्यंत स्मरण रहेंगे।

(लेखक- मुख्यमंत्री, छत्तीसगढ़ के प्रमुख सचिव हैं)


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