आर्ट ऑफ़ लिविंग की पहल - छत्तीसगढ़ का डोमा गांव बन गया मिसाल

By: Admin
Jun 05 2017
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महेन्द्र कुमार मानीकपुरी विद्युत कर्मी हैं और डोमा गांव के एक ऐसे समाज में सामान्य जीवन यापन कर रहे थे जहाॅं ड्र्ग्स, शराब, जातीवाद चरम पर था। तमाम दबाव के बाद भी शराब से दूर रहने और काम के अभाव में उनका जीवन उदासी से भरा था। उन्हे नहीं पता था कि वे एक ऐसे आंदोलन का हिस्सा बनने जा रहे हैं जो उनके गांव का कायाकल्प कर देगा।


महेन्द्र और ऐसे ही अन्य युवाओं ने ग्राम पंचायत के साथ मिलकर छत्तीसगढ का पहला गांव बना दिया जो खुले में शौच नहीं करता है। इतना ही नहीं उन्हौने गांव में शराब व ड्र्ग्स की समस्या को दूर किया है। लगातार साफ-सफाई पर ध्यान और ब्लड डोनेशन के केम्पों का आयोजन किसा जाने लगा है तथा जलग्रहण प्रबंधन के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय कार्य किया है।

यह सब 2007 में महेन्द्र के जीवन में हुआ और उसका जीवन बदल गया।परमानंद साहू जिन्हौने युवाओं को प्रेरित किया और आर्ट आॅफ लिविंग का वाएलटीपी कार्यक्रम गांव में किया और वे कहते हैं कि अब वे इस गांव को बचा सकते हैं।

इस कार्यक्रम में 15 लोग आए और सभी उर्जा से भरपूर हो कर गए, उनके पास अब प्रेरणा थी और ललक थी कि समाज में कैसे बदलाव ला सकते हैं। इसके लिए उन्हे किसी पर निर्भर रहने की भी आवश्यकता नहीं थी। उन्हौने समाज को अपने साथ जुडने के लिए अपील की, उन्हौने ध्यान, सत्संग का आयोजन किया और गांव में भईचारा लाने का महती प्रयास किया।

एक प्रेरित समाज क्या नहीं कर सकता है.....! युवाओं ने सुबह प्रभातफैरी का आयोजन किया, भजन गाए और गांव की प्रत्येक गली से गुजरे तथा गलियों को साफ किया। यह क्रम प्रतिदिन दोहराया। साथ में मिलकर उन्हौने निर्धारित किया कि वे गांव से शराब को भी दूर कर देंगे। उन्हौने 40 लोगों को इससे बाहर निकाला। आज डोमा एक साफ-सुथरा गांव है। आज भी गांव में प्रभात फरी और भजन चलाए जा रहे हैं।


धमतरी के कलेक्टर ने डोमा को बाहर शौच रोकने के लिए और टायलेट बनाने के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध करवाई। ग्राम पंचायत ने इसे चुनौती की तरह लिया और दो माह में सभी घरों में टायलेट का निर्माण कर दिया। स्वयंयेवकों ने घर-घर जाकर घर में टायलेट के फायदे बताए और जनमानस को जागरूक किया। 10 महिला और 10 पुरूष प्रतिदिन सुबह गांव में घर-घर जाकर खुले में शौच के लिए मना करने का कार्य किया। इस कार्य के लिए उन्हे मुख्यमंत्री से पुरस्कृत भी किया गया।

महेन्द्र जो आर्ट आॅफ लिविंग के शिक्षक है और वे आर्ट आॅफ लिविंग के ध्यान व श्वांस के करीब 60 कोर्स इस क्षेत्र में ले चुके हैं, कहते हैं, ‘‘यह सत्संग ही था जिसने मेरे गांव को बदल दिया और हरेक को पास में ला दिया है, अपनापन ला दिया है। सबसे बडी बात कि महिलाएॅं इसमें आगे आई हैं और उन्हौने गांव को आगे लाने का बीडा उठाया है।’’

वे आगे कहते हैं, ‘‘कुछ साल पहले मैं अस्पताल में करंट लग जाने की वजह से भर्ती था। मैं काम पर था और 11000 वोल्ट का करंट मुझसे गुजर गया। लेकिन गांव में हरेक मेरे लिए खडा था, प्रत्येक दिन गांव वाले आते थे मुझे देखने। यह उन्ही का प्यार था कि मैं जल्द ही इससे उभर गया। आज डोमा गांव सबसे प्रतिष्ठित गांव बन गया है। हम हमारी समस्याएॅं स्वयं हल करने लगे हैं।’’


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