पर्यावरण दिवस विशेष : छत्तीसगढ़ के पेड़ पौधे कुछ कह रहे है - सुनिए आप भी

By: Admin
Jun 05 2017
0
hits:216

- जिनेन्द्र पारख 

कुछ दिनो पहले घर के आँगन में एक तड़पता हुआ कबूतर अचानक गिर गया और कुछ ही देर में वह मर गया । यह कबूतर मरने से पहले बहुत तड़पा होगा जगह जगह पानी खोजने पर भी नहीं मिलने के कारण मर गया होगा । संयोग की बात है कि उसी दिन छत्तीसगढ़ के बिलासपुर शहर में भी पारा 49.3 के पार चला गया मानो गर्मी अपने चरम सीमा में तांडव कर रही हो । पक्षियों का तड़पकर गिरना पारा बढ़ना नदी नालों का सुख जाना फ़सल ख़राब हो जाना बढ़ती गर्मी से प्रदेश  के कई हिस्सों में आग लग जाना अचानक प्रदेश में अस्थमा के मरीज़ बढ़ जाना इस बात का संकेत दे  रहे है कि अब और नहीं । 


मिट्टीए पेड़ पौधे तालाब सब एक स्वर में कह रहे है कि अब और नहीं बर्दाश्त कर सकते ।सवाल उठता है की इस बढ़ते तापमान बढ़ते प्रदूषण और कटते पेड़ के लिए आख़िर ज़िम्मेदार कौन है इसका सीधा सा जवाब है . इसके ज़िम्मेदार हम स्वार्थी इंसान है  सरकार की कमज़ोर नीतिया है एउद्योगपतियों के कारखानो में लगी आसमान छूती चिमनिया है पैसे के बदले पर्यावरण क़ानून को तोड़ने की छूट देने वाले अधिकारी है मौन पत्रकार और समाजसेवी संस्थाएँ है और मेरे और आप जैसे लोग है जिन्होंने सड़क में  लगे नल से बहता हुआ पानी देखकर रुककर कभी बंद नहीं किया जहाँ मन हुआ वहाँ  ये बोलकर कचरा फेंक दिया कि मेरे अकेले  के नहीं फेकने से क्या हो  जाएगाए असंख्य बार लाइट और ए॰सी॰ चालू कर घर  से बाहर चले गए  आदि । 

हम सभी गौरवान्वित महसूस करते है यह जानकार की नया रायपुर 21वी सदी की पहली ग्रीन  फ़ील्ड कैपिटल सिटी है लेकिन सर शर्म से झूक जाता  है  जब आँकड़े बताते है कि  वायु  प्रदुषण के मामले में रायपुर देश के टॉप 10 शहरों में शुमार हो गया । छत्तीसगढ़ पहले ऐसा नहीं था विकास की इस चकाचौंध में हमने उद्योग तो लगा लिए आलीशान टाउन्शिप भी बना ली लेकिन प्रकृति को सहेजना भूल गए । यह रायपुर शहर हमारा है यह प्रदेश अपना हैए  आज इसे बचाने का प्रयास नहीं किया तो कल हम भी कबूतर की तरह तड़पेंगे और हमारा भी अंत निश्चय होगा । बीमार प्रदेश को सेहतमंद बनाने और स्वस्थ जीवन के लिए जंगलए नदीए तालाबए पोखरों को बनाने बचाने जिंदा रखने के जतन करने होंगे वरना खुद के बनाए क्रंक्रीट के जंगल कलकारखानों पावर प्लांट की चिमनियों और धुंए के गुबार के बीच कही हम सब विलुप्त ना हो जाए । अब भी वक़्त है वक़्त रहते हम इन पेड़ पौधों की बात समझ ले


comments

No comment had been added yet

leave a comment

Create Account



Log In Your Account



;