फिल्‍म रिव्‍यू: आपातकाल को सजीव नहीं कर पायी 'इंदु सरकार'

By: Admin
Jul 28 2017
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हमारे देश में कुछ मुद्दों पर बात की ही नहीं जाती। कभी-कभी सालों में छुटपुट फ़िल्में आ जाती हैं लेकिन विवादास्पद समझ कर कुछ मुद्दों पर फ़िल्में बनाना अक्सर टाल ही दिया जाता है। पार्टिशन, इमरजेंसी जैसे कई मुद्दे हैं जिस पर बात की जानी चाहिए। दुनिया भर के सिनेमा ने अपनी इस तरह की समस्याओं पर कालजयी फ़िल्में बनाई हैं। नेशनल अवार्ड विनिंग डायरेक्टर डायरेक्टर मधुर भंडारकर ने 1975 की इमरजेंसी के दौर पर फ़िल्म बनायीं जो शायद आज की पीढ़ी के लिए बहुत बड़ी जानकारी है कि आख़िर उस दौर में हुआ क्या था? इमरजेंसी होती क्या है? मधुर की इस साहसी फ़िल्म में वो सबकुछ है जो लोकतंत्र के उस काले इतिहास को समझने में आज की पीढ़ी के काफी काम आएगी। मधुर सिर्फ एक मामले में चूक गए। जो शायद युवा पीढ़ी को गुमराह करे! मधुर ने फ़िल्म की शुरुआत में जोर-शोर से घोषणा कर दी कि यह फ़िल्म काल्पनिक घटनाओं पर आधारित है? क्या 1975 की इमरजेंसी कोई काल्पनिक घटना है? जब इस विषय पर उन्होंने फ़िल्म बनाने का साहस किया था तो उसे सत्य-घटना पर आधारित बताने की हिम्मत भी उन्हें दिखानी चाहिए थी। संजय गांधी, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी आदि के किरदार भी परदे पर उतारे गए। तुर्कमान गेट की ज़बरदस्ती भी दिखाई गयी। बल प्रयोग से हुई नसबंदियां भी दिखाई गयीं। फिर ये कल्पना कैसे हुई भंडारकर साहब?

बहरहाल, मधुर भंडारकर ने एक सशक्त फ़िल्म बनाई है, जिसके लिए वो जाने जाते हैं। विस्तृत रिसर्च के साथ सत्य-घटनाओं को कहानी में पिरोया गया है। इस तरह की कहानी में डर ये होता है कि कहीं डॉकुड्रामा का फील न आ जाए। मगर मधुर इसे एक इंफोटेनमेंट बनाने में कामयाब हुए हैं , जिसमें इन्फॉर्मेशन भी है और इंटरटेनमेंट भी। अभिनय के बारे में बात करें तो कीर्ति कुल्हरी 'इंदु सरकार' के तौर पर पूरी फ़िल्म अपने कंधों पर लेकर चली हैं और सफ़ल भी रही हैं। नील नितिन मुकेश भी अपने किरदार में एकदम जंचे हैं। तोता रॉय चौधरी नवीन के किरदार को ज़िंदा कर देते हैं। कुल मिलाकर इंदु सरकार उन दर्शकों के लिए नहीं है जो सिर्फ मसाला फ़िल्में देखना चाहते और जानते हैं। फ़िल्म देखने के लिए आपका ग्रे मैटर बहुत ज़रूरी है। अगर वो आपमें आप निश्चित ही इस फ़िल्म का आनंद ले पाएंगे या समझ पाएंगे! मैं इस फ़िल्म को 5 में से 3.5 स्टार देता हूं।


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