पाकिस्तानी आतंकवाद और भारतीय मुसलमान - ज़फर नक़वी

By: Admin
Oct 08 2016
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बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना का कहना ठीक ही है कि पाकिस्तान एक हारी हुई ताक़त है। इसमें कोई शक भी नहीं कि पाकिस्तान औरो से तो हारा ही है, खुद उसके अपनों ने भी उसे धरातल तक ले जाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है.. स्वाधीन भारत की सत्ता में मुसलमानो की भागीदारी को लेकर मोहम्मद अली जिनाह का फार्मूला जब स्वीकार नहीं हुआ तो उन्होंने पाकिस्तान के गठन की मांग शायद ये सोच कर की होगी कि मुसलमानो का अपना देश बन जायेगा जो शांति और विकास की राह में अग्रसर होकर एक नयी पहचान बनाएगा और इस्लाम के सह -अस्तित्व के सिद्धान्तों के आधार पर अपने पड़ोसियो के साथ मधुर सम्बन्ध रखेगा। गाँधी जी ने भी राजनीतिक दूरदर्शिता से काम लेते हुए जिनाह की मांग पर शायद इसीलये हामी भर दी होगी कि स्वाधीन भारत में आबादी के लिहाज़ से कम होने के बावजूद मुसलमान कही हिन्दुओ पर हावी ना हो जाएं ,बहरहाल ये एक व्यापक बहस का विषय है और इस पर विभिन दृष्टि कोण सामने आ चुके है, फिर भी वास्तविकता क्या है कौन जाने ?अब ,क्योंकि पाकिस्तान के गठन के सवाल पर उस वक़्त कोई जनमत संग्रह नहीं हुआ था बल्कि ये तीन चार लोगो की आपसी सहमति का नतीजा था इसलिए देश के मुसलमानो की बड़ी आबादी ने पाकिस्तान जाने के बजाये भारत में ही रहना बेहतर समझा। ज़ाहिर है कि बिना जनमत संग्रह के विभाजन के फैसले पर मुसलमानो को अपना देश चुनने का पूरा अधिकार था ,इसलिए जिन मुसलमानो ने अपने मूल देश भारत में ही रहने का फैसला किया वो ना तो किसी का एहसान था और ना ही किसी को इस बात पर एहसान जताने का हक़ हासिल है. ,बहरहाल भारत के विभाजन की विभीषिका और पीड़ा से सब ही वाकिफ है उस का ज़िक्र करना बेकार है।
लेकिन विभाजन के बाद के लंबे काल तक देश में बाकी बचे मुसलमानो से घृणा और हर स्तर पर उनकी उपेक्षा से हो सकता है कि उस वक़्त मुसलमानो को पाकिस्तान ना जाने के अपने फैसले पर अफ़सोस हुआ हो और ये वो ही ज़माना था जब हाकी और क्रकेट के मुक़ाबलों में पाकिस्तान के हाथो भारत की हार पर कुछ कुंठित भारतीय मुसलमान बम और पटाखे छोड़कर व् मिठाई बाँट कर ख़ुशी मनाते थे लेकिन पकिस्तान के वर्तमान हालात को सामने रख कर भारतीय मुसलमानो को अब इस बात पर ख़ुशी का एहसास अवश्य होगा कि ६६ वर्ष पूर्व भारत में ही रहने का उन का फैसला बिलकुल सही था।क्योकि तमाम तर विवादों के बाद भी हमें ये यह स्वीकार करने में कोई बाध्यता या परेशानी नहीं होना चाहिए कि भारत के मुसलमान पाकिस्तानी मुसलमानो से ज़्यादा पुर सुकून और बेहतर हालत में हैं। पाकिस्तान का दुर्भाग्य ये है कि अपने गठन के बाद से ही वो भाषा,प्रान्त और सम्प्रदायो के बंधनो में इस क़दर बंध गया कि वो एक देश होने के बावजूद एक सम्पूर्ण राष्ट्र नहीं बन पाया ,उस की बड़ी वजह वहाँ के शासक ही है जो अपनी विलासिता और प्रशासनिक अक्षमताओं की वजह से देश को शांति और विकास के मार्ग पर प्रशस्त नहीं कर पाए ,इसी कारण अपने गठन के मात्र २४ वर्ष के अल्पकाल में ही पकिस्तान के दो टुकड़े हो गए , अब उस विभाजन का आरोप पकिस्तान के शासक भले ही भारतीय प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गाँधी पर लगाएं ,लेकिन सच तो ये है कि पाकिस्तानी फोजी शासको के अत्याचार और भेदभाव ही पृथक बांगला देश के ज़िम्मेदार हैं। पाकिस्तान ना ही इस्लामी मुल्क बना पाया और ना ही लोकतान्त्रिक। वहां के लोग भले ही खुद को इस्लामी मुल्क समझते हों लेकिन जहाँ मस्जिदें ,दर्सगाहे ,इमामबाड़े और दरगाहें ही सुरक्षित ना हो ,उस मुल्क को इस्लामी नाम देना तो इस्लाम का घोर अपमान ही है।
दरअसल पाकिस्तान में जब से घरेलु स्तर पर साम्प्रदायिक आतंकवाद और कश्मीर के नाम पर निर्याती आतंकवाद का असहनीय और अमानवीय खेल शरू हुआ तब से भारतीय मुसलमानो के दिल में विभाजित परिवारों के एक देश के रूप में पाकिस्तान के प्रति जो भी सहानुभूति थी वो एक दम ठंडी पड़ चुकी है। ये बड़ी हैरत और आश्चर्य की बात है कि पाकिस्तान के शासक एक ऐसे मामले में ,जिस का निदान उनकी मंशा के अनुरूप अब असंभव है , लंबे काल से अपनी आर्थिक और सैन्य शक्ति को क्यों दाव पर लगाए हुए है? मै तो कतई नहीं समझता कि कश्मीर के दोनों हिस्से एक हो सकते है ,बेहतर तो यही था कि दोनों देश इस बात पर ही सहमत रहते कि जो जिस के पास है ,उसी पर क़ायम रहा जाए ,फिर पाकिस्तान जो अपने बाकी बचे सूबे ही नहीं संभाल पा रहा हो वो किस रणनीति के तहत उस कश्मीर की आज़ादी की मांग कर रहा है ,जिस पर खुद कश्मीरी मुसलमान ही हुकूमत कर रहे हैं। वो अपने आतंकवादी मनसूबे के तहत अगर भारतीय सेनिको को निशाना बना रहा है तो उसके नकारात्मक नतीजे खुद कश्मीरियो को ही भुगतने पड़ रहे हैं बल्कि आतंक के विरोधी कश्मीरी भी आतंकवाद का शिकार हो रहे हैं ,उनके कारोबार ख़त्म हो गए हैं। पाकिस्तान की ये विघटन कारी नीति आखिर किस लिहाज़ से कश्मीर और कश्मीरियत की सरक्षक या सहायक कही जा सकती है ,आखिर पाकिस्तान अपनी अमानवीय नीतियो के द्वारा कौन से इस्लाम को परिभाषित कर रहा है ?

पाकिस्तानी शासको को अगर अपने देश की जनाकांक्षाओ का ज़रा भी पास होता तो वो अपने इस्लाम विरोधी विस्तारवादी दृष्टिकोण को त्याग कर देश की आंतरिक स्थति को सुधारने की चेष्ठा करता ,अपने पड़ोसियो के साथ आर्थिक ,शैक्षिक और सामाजिक रिश्ते मज़बूत करके देश को समग्र विकास पर अग्रसर करता और दोनों ओर के परिवारों ,रिश्तेदारो और सम्बन्धियो को मिलने जुलने के सुलभ और सुखद साधन उपलब्ध कराता जो वर्षो पूर्व कुछ लोगो के अहँकार और सत्ता ललक की वजह से बिछुड़ चुके हैं।मुझे ये लिखने में ख़ुशी हो रही है कि कुछ अपवादों को छोड़ कर भारतीय मुसलमान ना ही पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवादी संगठनो और ना ही तथाकथित इस्लामिक स्टेट (आइ एस आइ एस ) के झांसे में आए है ,इस के बावजूद आतंकवाद के विरुद्ध भारतीय मुस्लिम संगठनो से कम से कम और कड़े क़दम उठाना चाहिए था। 
हम लंबे समय से देश भर में बड़ी बड़ी जनसभाओ के माध्यम से यह चीख रहे है कि आतंकवाद का इस्लाम से कोई सम्बन्ध नहीं है ,कहने को तो बात बिलकुल ठीक है , लेकिन इसका पाकिस्तान पर कोई असर नहीं हो रहा है , और वो आतंकवाद का निरंतर विस्तार कर रहा है ,भला बगैर सरकारी मदद और सरपरस्ती के पकिस्तान के अंदर आतंकवादी केम्प किस तरह चल सकते हैं। ये ठीक है कि पकिस्तान में चल रही आतंकवादी घटनाओ और भारत में सीमा पार से होने वाली तथकथित जिहादी गतिविधयो के विरुद्ध हम व्यवहारिक रूप से कुछ नहीं कर सकते वो काम देश की सरकार का है लेकिन जब हम ये मानते है कि पकिस्तान की इन हरकतों से इस्लाम की बदनामी हो रही है और हमारे कुछ निर्दोष नोजवान पकडे जा रहे है तो हम भारतीय मुसलमान अपने स्तर पर विरोध स्वरूप भारत स्थित पाकिस्तानी दूतावास के सरकारी आयोजनों ,रोज़ा इफ्तार और ईद मिलन व् पकिस्तान दिवस के प्रोग्राम का बायकाट तो कर ही सकते है, भले ही भारतीय प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ की दावत खाने लाहौर जाये या कही ओर, लेकिन हम इस्लाम और मुसलमान को आतंकवाद से अलग करने की गरज़ से पाक शासको को ये पैग़ाम तो दे ही सकते है कि जब तक पाकिस्तान में आतंकवाद जारी रहेगा तब तक हम उसके दूतावास में होने वाले प्रोग्रामो का बायकाट करेंगे। क्योंकि इस्लाम ने उन लोगो से दूरी बनाने की सख्त हिदायत दी है ,जो इस्लाम का नाम भी लेते हैं और इस्लाम को बदनाम भी करते है। उरी फौजी केम्प पर हुए आतंकवादी हमले के बाद मुस्लिम समाज की वैसी प्रतिकिर्या नहीं आई जितनी सशक्त आना चाहये थी। भारत और पाकिस्तान के बीच जो भी तनाव या विवाद है वो किसी इस्लामी बिंदु को लेकर नहीं है क्योंकि ज़मीन को लेकर विवाद हो या फिर सीमा पर शक्ति का प्रदर्शन , इस्लाम कहीं बीच में नहीं आता ,फिर परमाणु बम के इस्तेमाल को लेकर पकिस्तान की और से दी जाने वाली धमकी भी न्यायोचित नहीं क्योंकि व्यापक जनसंहार वाले हथयारों का इस्तेमाल भी इस्लामी कानून के मुताबिक़ हराम है।


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