लिंगभेद से परे है दिव्यता - श्री श्री रवि शंकर

By: Admin
Feb 22 2017
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-  श्री श्री रवि शंकर जी

शिव का अर्थ ही है, आपकास्वयं का आंतरिक सत्व। शिव का अर्थ श्रेष्ठ या उदार होना भी होता है। रात्रि का मतलबहै जहाॅं हम विश्राम कर सकें। रात को सब कुछ षांत और स्थिर हो जाता है और षरीर थकानके कारण नींद में चला जाता है। शिवरात्रि का षाब्दिक अर्थ है, तीनों गुणों में शिवतत्व या आत्मज्ञान प्रस्फूटित हो। समाधी को अक्सर शिव के समान माना गया है, इसे समझनाथोडा कठिन हो सकता है। कबीरदास जी इसे लाखों वर्षों का विश्राम एक क्षण में समाहितहोने की बात कहते हैं। यह विश्राम सर्तकता की अवस्था में होता है और हमारी सारी पहचानसे हमें मुक्त कर देता है। जब मन दिव्यता के साथ विश्राम करता है तो वही वास्तविक विश्रामहोता है।

मन, बुद्धि और चित्त कीतरह ही शिव में हमारे अंदर एक तत्व की भाॅंति विद्यमान हैं। शिव तत्व और षक्ति के एकहो जाने को ही शिवरात्रि कहते हैं। शिवरात्रि इसलिए भी पवित्र है क्योंकि वह दिन औरअधिक जागृत होता है और उस दिन नींद नहीं लेने का प्रावधान का भी यही कारण है। शिवरात्रिके संबंध में कथा है कि इस दिन शिव और षक्ति का मिलन हुआ था। मौलिक और सक्रिय उर्जाका अंदर की उर्जा से मिलन या उनका विवाह। शिव मौन के साक्षी हैं तो षक्ति अभिव्यक्तिकी। शिव निर्विकार हैं तो षक्ति उनका व्यक्त स्वरूप है। यह वास्तव में द्वैत और अद्वैतके संबंधों की पहचान है। ब्रम्हा के इस अदैत स्वरूप को पहचानना ही शिवरात्रि है।

शिव मंदिरों में शिव कोलिंग के रूप में स्थापित किया जाता है। लिंग देखा जाय तो तीन प्रकार के होते हैं पुरूष,स्त्री और उभयलिंगी। दिव्यता लिंगभेद से परे होती है इसलिए दिव्यता एकलिंग कहा जाताहै।

अब प्रष्न है कि यह एकलिंगक्या है? आत्मा या खुद। षरीर, मन और चित्त से परे, प्रिय अप्रिय से परे जो है वह सिर्फएकलिंग ही है। लिंग का अर्थ पहचान या चिन्ह होता है। सिर्फ चिन्ह के कारण पुरूष यास्त्री या उभयलिंग की पहचान कर सकते हैं। एकलिंग भी एक चिन्ह है और दिव्यता लिंगभेदसे परे है।

स्वयं भगवान एकलिंग हैं।शिवरात्रि के दिन संपूर्ण ब्रम्हांड में षक्ति का संचार होता है। समस्त लिंगों की शिवषक्तिशिवरात्रि पर विलीन हो जाती है। शिवरात्रि पर उॅं नमः षिवाय का मंत्रोच्चार और ध्यानकिया जाय तो उससे समस्त पापकर्मों से मुक्ति पाने जैसी षक्ति व्याप्त है। इसके बादही नवीन कार्यों को प्रारंभ किया जाता है।

शिव को विनाष से जोडा गयाहै परंतु बदलाव या बेहतरी तभी संभव हो जब कुछ खत्म होकर फिर से नवीनता से निर्मित हों।‘षंकर’ षब्द के अर्थ में ही छुपे हैं श्रेष्ठता, उत्तमता और षांति।

शिव विनाष के साथ षांतिऔर आनंद भी प्रदान करते हैं। संपूर्ण सृष्टि शिव का ही अभिष्ट स्वरूप है। एक ही चेतनाजिससे सब कुछ उत्पन्न हुआ। सिर्फ जागृत होने से यह ज्ञान चेतना से मिलता है। शिवरात्रिइसी चेतना की जागृत अवस्था को नींद में जाए बगैर मनाने का ही पर्व है। इस अवस्था मेंजाने पर ही आपको पता चलता हैै कि आप यहाॅं यंत्रवत नहीं हैं बल्कि दिव्य है। यही जागरूकताआज की आवष्यकता है। सारा विष्व इसी बुद्धिमतता और सरलता की षुभ लय से चलता है और वास्तवमें यही शिव है। शिव षाष्वत और स्थिर उर्जा है और स्वयंभू हैं।


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