ईवीएम में गड़बड़ी अजीब मुद्दा : जिनेंद्र पारख

By: Admin
Mar 18 2017
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इस लेख के शीर्षक को पढ़कर आप लोग को भी अजीब लग रहा होगा, लेकिन ईवीएम में गड़बड़ी के आरोप लगाना सच में एक अजीब मुद्दा है जो सिर्फ़ हार के बाद जन्म लेता है । हार के बाद दो मार्ग होते है, एक तो लोकतंत्र का हवाला देते हुए हार को विनम्रता से स्वीकार कर लो और दूसरा संप्रदायिकता, ध्रुविकरण, जाती का मामला उठाकर बहुमत वाली पार्टी पर आरोप लगा दो । लेकिन अब राजनीति में आरोप के दायरे भी बढ़ते जा रहे है ।वर्तमान परिस्थिति को देखकर सामान्य वोटर को लग रहा है कि बसपा, आप, सपा और कांग्रेस हार से पूरी तरह टूट चुकी है और बौखलाहट के चलते ऐसे बयान दे रही है । यह सच है की राजनीति में चुनाव जीतने के लिए राजनैतिक दल साम, दाम, दंड और भेद से विजय प्राप्त करते है किंतु ईवीएम में गड़बड़ी कहना उस बच्चे की आदत के जैसे प्रतीत हो रहा है जो बचपन में अंक कम मिलने पर शिक्षक पर ठीकरा फोड़ता है ।क्या विपक्ष का मनोबल इतना टूट गया है कि अब 5 राज्यों के चुनाव नतीजों के लिए ईवीएम पर भी सवाल उठाने लगे है। बीएसपी की सुप्रमो मायावती के बाद अब आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल ने भी चौकाने वाले आरोप लगाये है। केजरीवाल का कहना है कि आप के पंजाब में मिलें वोटों में से 20 से 25 फीसदी शिरोमणी अकाली दल को चले गए और इसलिए पंजाब में आप जीत नही पाई। क्या इन आरोपों में दम है या फिर चुनाव में खराब प्रदर्शन के बाद कुछ पार्टियां बहाने ढूंढ रही है।5 राज्यों में चुनाव के बाद इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों पर विवाद है कि थमने का नाम नहीं ले रहा है। मायावती ने इस मुद्दे को कोर्ट में ले जाने और आंदोलन करने का इरादा जताया है। केजरीवाल का यहां तक कहना है कि ईवीएम में गड़बड़ी के साफ सबूत हैं और कई बूथों पर वोट से ज्यादा कार्यकर्ता मिले है।लेकिन मशीन में गड़बड़ी होने की बात नयी नहीं है । साल 2009 में लोकसभा चुनावों में हार के बाद बीजेपी के लालकृष्ण आडवाणी ने ईवीएम पर सवाल उठाए थे। आडवाणी ने परंपरागत मतपत्रों की वापसी की मांग की थी। वहीं डेमोक्रेसी एट रिस्क, कैन वी ट्रस्ट आवर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के नाम पर जी वी एल नरसिम्हा राव ने ईवीएम की गड़बड़ी पर किताब लिखी है जिसकी भूमिका लालकृष्ण आडवाणी ने लिखी थी। इस किताब में ईवीएम से धोखाधड़ी पर विस्तार से चर्चा की है। 2012 और 2016 में कैप्टन अमरिंदर सिंह ने भी वोटिंग मशीन पर सवाल उठाते हुए कहा था की अकाली दल हर बार टेम्पर करवाते है । TDP चंद्रबाबू नायडू ने भी 2010 में ईवीएम को लेकर काफ़ी बवाल मचाया था सबसे बड़ा सवाल उठता है की क्या वास्तव में मशीन में गड़बड़ी हो सकती है? एक आम वोटर के सभी सवालों का जवाब चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय ने कई बार दिया है । इन सभी के आरोपों का खंडन करते हुए चुनाव आयोग का कहना है कि ईवीएम पूरी तरह सुरक्षित और भरोसेमंद हैं। हालांकि अब तक अलग-अलग कोर्ट में ईवीएम पर सवाल उठाये गये थे और अदालतों ने ईवीएम की विश्वसनीयता पर मोहर लगाई है। साल 2000 से ईवीएम का इस्तेमाल हो रहा है और आयोग को इसमें गड़बड़ी की शिकायत नहीं मिली है।राजनैतिक पार्टियों द्वारा ईवीएम मशीन पर लगाए जा रहे आरोपों का खंडन करते हुए चुनाव आयोग की दलील है कि ईवीएम में ना इंटरनेट है और ना किसी तरह के सर्वर से कनेक्ट किया जाता है। जिसके चलते इसकी ऑनलाइन हैकिंग नहीं की जा सकती। चुनाव आयोग ने यह भी कहा है कि वोटिंग शुरू होने से पहले ईवीएम की टेस्टिंग होती है। मॉक पोलिंग में सभी पोलिंग एजेंट से वोट डलवाए जाते हैं और एजेंट देखते हैं कि उनके उम्मीदवार के पक्ष में वोट डल रहे हैं। इसके बाद पोलिंग एजेंट ईवीएम ही होने का सर्टिफिकेट प्रभारी को देते हैं। मॉक पोलिंग के बाद ही वोटिंग शुरू की जाती है। हर पोलिंग बूथ में वोटरों की डिटेल रजिस्टर में लिखी जाती है और ईवीएम के वोटों का मिलान रजिस्टर से किया जाता है।ईवीएम मशीन को अन्य देशों में बैन किया गया है। नीदरलैंड में पारदर्शिता में कमी के चलते ईवीएम मशीन को बैन किया गया हैं। वहीं 3 साल के रिसर्च के बाद आयरलैंड में भी इसे बैन कर दिया गया। ईवीएम को असंवैधानिक बताते हुए जर्मनी सहित इटली और अमेरिका के कई राज्यों में इसे बैन कर दिया गया है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है की भारत में भी ऐसा ही होगा । हर देश की अपनी अपनी व्यवस्था होती है और वर्तमान में भारत में ईवीएम की विश्वसनीयता क़ायम है । असल में सच तो यह है की ईवीएम में छोटी -मोटी तकनीकी ख़ामियाँ ज़रूर हो सकती है किंतु इन ख़ामियों को बड़ा मुद्दा बनाना और इसे भाजपा की जीत का कारण बताना गले से नहीं उतरता। यह सब तभी होता है है जब हार के असल कारणों से मुँह मोड़ना हो । इस अजीब और माडर्न चुनावी मुद्दे को लेकर हमें अपना और देश का समय व्यर्थ नहीं करना चाहिए ।
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